इंसेफेलाइटिस का दानव...
इंसेफेलाइटिस की रोकथाम के लिये सरकारें हाथ पैर तो खूब मारती दिखती हैं... लेकिन क्या इन सबके बावजूद इस बीमारी पर लगाम कसी जा सकी है.... नहीं...... सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकेले उत्तर प्रदेश में ही हर साल इस बीमरी से सैकड़ों लोग मारे जाते हैं... गैर सरकारी आंकड़े तो मौतों की संख्या हज़ारों में बताते हैं... इतनी मौतें होने का कारण तक पता है लेकिन मौतों का ये सिलसिला अब तक रोका नहीं जा सका है... पूर्वांचल में अगर दिनोदिन मरीजों की संख्या बढती है तो बढे... शायद इससे आला अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ता....इसका कारण ये है कि वे इन इलाक़ों में नहीं रहते.... यहां के लोग उनसे सवाल नहीं पूछ सकते... उन्हें अपने आंसू नहीं दिखा सकते... लेकिन ब्लू लाइन बसें या इन सरीखई दूसरी घटनाएं ज़िन्दगियों को रौंदती हैं तो खूब हो हल्ला होता है.... शायद पूर्वांचल की दिल्ली से दूरी मौतों की अहमियत को खत्म कर देती हैं.... झोपड़ों और गन्दे गली कूचों से निकली रोने चिल्लाने की आवाज़ें... राजधानी में बैठे राजनेताओं तक पहुंचने से पहले ही... उनके महलों दी दीवारों पर सिर पटक पटक कर दम तोड़ देती हैं... लेकिन उन कानों तक नहीं पहुंच पाती जिनमें सत्ता की गूंज समायी हुई होती है... झूठ की खाद और वायदों के पानी से सींचे गये वोट बैंक की याद तो राजनेताओं को केवल तब आती है... जब चुनावी मौसम में वोटों की फसल काटनी होती है... रोते बिलखते लोगों को दिलासा देने राज्यपाल से लेकर बड़े-बड़े नेता जाते तो ज़रूर हैं.... लेकिन केवल वायदों का मलहम लगाने और घोषणाओं की घुट्टी पिलाने के लिये... लेकिन ये दवा असर करने से पहले ही हवा में कपूर की तरह घुल जाती है... और अपने पीछे छोड़ जाती है एक निशान... जो काम आता है विरोधी पार्टियों के.... ताकि वो वायदों के इन दाग़ों की दुहाई देकर चुनावी बसन्त में फिर से एक बार वायदों की फसल काट सकें....


1 Comments:
Very true. But every thing cannot be left to Govt. We need to keep the surroundings clean to keep mosquitoes away.
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